क्या उत्तर प्रदेश भाजपा का वाटरलू होगा ?

भाजपा के लिये अगले साल होने वाला उत्तर प्रदेश का चुनावी युद्ध निर्णायक साबित होगा और भारतीय राजनीति की दिशा तय करेगा। उससे पहले होने वाले चुनाओं और वहां की तैयारियों के आधार पर आशंका उबरती है कि कहीं यूपी भाजपा के लिये वाटरलू न साबित हो।   

यूरोप में वाटरलू वह स्थान है जहाँ वर्ष फ्रांसीसी सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट की सेनाओं ने अपने शत्रुओं से निर्णायक युद्ध लड़ा था। वाटरलू के युद्ध ने यूरोप के इतिहास की धारा बदल दी। शायद ऐसा ही निर्णायक चुनावी युद्ध उत्तर प्रदेश में लड़ा जायेगा जहाँ अगले वर्ष आने वाले विधानसभा चुनाव भारतीय राजनीति की दिशा तय करेंगे अस्सी लोकसभा सदस्य और 400 विधानसभा सदस्यों वाला उत्तर प्रदेश भारतीय राजनीति में सबसे अहम भूमिका का निर्वाह करता है। उत्तर प्रदेश में जनाधार के बिना दिल्ली में किसी भी दल के लिये सरकार चलाना मुश्किल माना जाता है. पिछले लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी (भाजपा) को उत्तर प्रदेश में 80 में से 73 सीटों पर सफलता प्राप्त हुई जो आज मोदी सरकार को स्थायित्व दे रही है।

पर लगता है कि वर्ष 2014 अप्रैल-मई के लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा ने उत्तर प्रदेश में अपना जनाधार बहुत तेजी से गवाया है और ऐसा नहीं लगता कि अगले वर्ष चुनाव में वह वर्ष 2014 की चुनावी सफलता को दुहरा पायेगी। यदि वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पड़ता है तो बेशक वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में उसकी डगर बहुत मुश्किल होगी।

स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश का चुनाव जीतने के लिये भाजपा कोई भी कसर नहीं रखेगी। वह अपनी सम्पूर्ण शक्ति और संसाधन इन चुनावों में लगायेगी। कुछ लोगों को मानना है कि डॉ. सुब्रमणियम स्वामी द्वारा राम मंदिर का मुद्दा उठाना भाजपा की चुनावी तैयारी का उद्घोष है। उद्घोष करना आसान है पर बिना ठोस तैयारी और हरबे हथियार के युद्ध लड़ना और उसे जीतना मुश्किल है। उत्तर प्रदेश में भाजपा के समक्ष काफी समस्याएं हैं। शायद इनमें सबसे बड़ी समस्या अच्छे नेतृत्व का अभाव है। भाजपा के अधिकांश बड़े नेता कलराज मिश्र, राजनाथ सिंह और लक्ष्मी शंकर वाजपेयी सवर्ण वर्ग से आते हैं। उत्तर प्रदेश के पिछड़े और दलित वर्ग द्वारा नियंत्रित राजनीति में किसी सवर्ण वर्ग नेता के नेतृत्व में लड़े जाने वाले चुनाव में विजयी होना अब बहुत हद तक असंभव लगता है। भाजपा के पिछड़े वर्ग बड़े नेताओं में दो नाम है- विनय कटियार मुख्यमंत्री पद के लिये पूर्णतः अनुपयुक्त हैं और कल्याण सिंह आजकल राजस्थान में राज्यपाल हैं। इन दो के अतिरिक्त पिछड़े और दलित वर्गों का कोई ऐसा कद्दवार नेता भाजपा के पास नहीं है जो मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी के दलित वोट खींच कर भाजपा की झोली में डाल सके।

भाजपा और संघ परिवार से जुड़े विश्वस्त सूत्रों के अनुसार भाजपा का शीर्ष नेतृत्व कल्याण सिंह को उत्तर प्रदेश की कमान सौंपने का मन बना चुका है और शीघ्र ही कल्याण सिंह राज्यपाल का पद छोड़कर सक्रिय राजनीति में आ जायेंगे।

कल्याण सिंह भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनका अच्छा प्रभाव है। पर समस्या यह है कि कल्याण सिंह लगभग 78 वर्ष के है  और कमान उनको सौंपना प्रधानमंत्री मोदी के उस नियम का उल्लंघन करना होगा जिसके रहते 75 वर्ष से अधिक आयु के नेताओं को सक्रिय राजनीति से सेवानिवृत्त हो जाना चाहिये।

शायद भाजपा समाजवादी दल के साथ विचार कर रही है इसलिये कल्याण सिंह को बुलाया जा रहा है। पिछले दिनों बिहार महागठबंधन से निकल कर और फिर कुछ बयान देकर मुलायम सिंह ने भी भाजपा के करीब आने के संकेत दिये हैं। भाजपा के साथ आने पर समाजवादी दल को अपना मुस्लिम समर्थन तो अवश्य खोना पड़ेगा पर उसकी सत्ता में वापसी सुनिश्चित हो जायेगी।

उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार के रहते समाजवादी दल का जनाधार तो अवश्य कम हुआ है लेकिन उसकी स्थित बहुत कमजोर नहीं है। पर प्रश्न यह है कि ऐसे चुनावी समझौते से भाजपा को क्या लाभ होगा।

सच तो यह है कि बड़े-बड़े दावों और जोरदार बयानों के बावजूद भाजपा आज उत्तर प्रदेश में समाजवादी दल और बहुजन समाज पार्टी के बाद तीसरे नंबर पर है। पिछले स्थानीय निकायों और पंचायत के चुनाव में भाजपा को शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ा है। सरपंचों के चुनाव भाजपा प्रधानमंत्री के वाराणसी चुनाव क्षेत्र में, जयापुर तक के उस गांव में हार गई जो प्रधानमंत्री ने गोद ले रखा है। इसी तरह उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष लक्ष्मी शंकर वाजपेयी के गांव में भी भाजपा विजयी न हो सकी।

शायद इससे भी बड़ी बात उस मोदी लहर का पूरी तरह समाप्त हो जाना है जिसके दम पर भाजपा केन्द्र में सत्ता में आई थी। बिहार विधानसभा के जिन 26 चुनाव क्षेत्रों में प्रधानमंत्री ने चुनाव सभाएं की उनमें 20 क्षेत्रों में पार्टी की हार हुई। पिछले दिनों दिल्ली से लगे नोएडा में प्रधानमंत्री की रैली में पंडाल खाली पड़े रहे। पूरे प्रयासों के बावजूद भाजपा के नेता और कार्यकर्ता अनुमानित डेढ़ लाख लोगों की जगह मात्र 15,000 की भीड़ जुटा पाये। मोदी सरकार में पर्यटन मंत्री डॉ. महेश शर्मा इसी क्षेत्र से सांसद हैं।

मोदी लहर समाप्त होने के जो भी कारण हों, दो बाते तो साफ है। एक तो यह है कि बिहार के परिणामों ने उत्तर प्रदेश पर गहरा प्रभाव डाला है। आज उत्तर प्रदेश का मतदाता भी यह महसूस करता है कि उसे मीठी और लच्छेदार बातों के अलावा मोदी सरकार ने कुछ भी नहीं दिया। दूसरी बात यह है कि स्वामी आदित्यनाथ, साध्वी निरंजन ज्योति और साक्षी मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक वर्ग बल्कि उदारवादी हिन्दू वर्ग भी भाजपा से पूरी तरह कट गया है। राम मंदिर मुद्दा उठा कर यदि भाजपा हिन्दू ध्रुवीकरण द्वारा चुनाव जीतने की सोच रही है तो वह गलतफहमी का शिकार है। कोसी परिक्रमा की असफलता से भाजपा को यह समझ जाना चाहिये था कि नरेन्द्र मोदी के विकास के नारे पर वोट दिया था न कि राम मंदिर पर।

प्रबुद्ध मतदाताओं का वर्ग असहिष्णुता के मुद्दे पर भी भाजपा का समर्थन नहीं करेगा। उत्तर प्रदेश की मानसिकता उदारवादी है और जिस गंगा-जमुनी तहजीब की बात की जाती है,  लखनऊ उसका केन्द्र है। भाजपा नेता यह समझे या न समझें उत्तर प्रदेश की मानसिकता समझने वाले जानते हैं कि जवाहर लाल नेहरू और नेहरू-गाँधी परिवार पर नरेन्द्र मोदी और उनके साथियों ने जो लगातार प्रहार किया है उससे राज्य में कांग्रेस की शक्ति बढ़ी ही है। इसका स्पष्ट प्रभाव चुनाव में ही दिखाई पड़ेगा। बिहार की तरह उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस पिछले चुनाव से बेहतर करेगी।

प्रधानमंत्री मोदी के पास अभी भी समय है। पर क्या वह अब भाजपा को हिन्दुत्ववादी तत्वों के चंगुल से छुड़ाकर अटल बिहारी वाजपेयी वाली उदारवादी छवि दे पायेंगे जिसके चलते भाजपा को उत्तर प्रदेश में सत्ता प्राप्त हुई थी। अभी तो ऐसा नहीं लगता लेकिन भविष्य के गर्भ में क्या है कह पाना मुश्किल है।

(प्रो.प्रदीप के. माथुर लेखक संचार शिक्षाविद और वरिष्ठ पत्रकार हैं)   

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