भारत-जापान संबंधों में गरमाहटः चीन में बौखलाहट

जापानी कंपनियां बड़े पैमाने पर भारत में निवेश कर रही हैं। चीन की तुलना में जापान का व्यापार भारत में कम है किन्तु जापान का पूँजी निवेश तेजी से हो रहा है। अधिकांश निवेश औद्योगिक उत्पादन बढ़ाने, तकनीकी ट्रांसफर और आधारभूत ढ़ांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) के लिए होगा। जापानी निवेश मोदी के “मेक इन इंडिया” के सपने को साकार करने में सहायक सिद्ध हो सकता है।

सुदूर पूर्व में स्थित उगते सूरज का देश जापान सांस्कृतिक दृष्टि से भारत के बहुत करीब रहा है। लगभग डेढ़ हजार वर्ष पूर्व हिन्दू और बौद्ध धर्म भारत से जापान पहुंचे जिनका प्रभाव वहां के जनजीवन पर आज भी देखा जा सकता है। जापान के अधिकांश नागरिक बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं। जापान के शहर क्योटो में 2000 से अधिक मंदिर हैं, काशी और क्योटो की यह समानता दिलों को जोड़ने वाली है। प्रधानमंत्री शिंजो अबी पिछले सप्ताह जब भारत की यात्रा पर थे तो प्रधानमंत्री मोदी के साथ काशी गये थे और वहां उन्होंने गंगा आरती में भाग लिया।

जापानी प्रधानमंत्री की हाल में ही भारत यात्रा दोनों देशों के राजनैतिक और आर्थिक संबंधों के लिए मील का पत्थर साबित हो सकती है। भारत पहला देश है जो अभी नान प्रालिफरेशन ट्रीटी (एन.पी.टी.) में नहीं है फिर भी जापान ने उसके साथ सिविल न्युक्लियर पर सहमति प्रदान की है। शांतिपूर्ण कार्यों के लिए यह समझौता भारत के लिए अत्यंत लाभप्रद होगा। इस दिशा में भारत 2008 से प्रत्यनशील था, सफलता अब मिली है। यह सहमति उसी प्रकार की है जो अमेरिका ने पिछले वर्ष दी थी।

जापान के साथ रक्षा संबंधी जो समझौते हुए हैं वे भी महत्वपूर्ण हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहली बार जापान अपनी आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने में लगा है। हाल ही में प्रधानमंत्री शिजों अबी के नेतृत्व में जापानी संसद ने संविधान की धारा 9 में परिवर्तन किया है जिसके फलस्वरुप जापान सैन्य शक्ति बढ़ा सकता है, रक्षा उपकरणों के उत्पादन बढ़ा सकता है और अपनी और मित्र देशों की सुरक्षा के लिए रक्षा समझौते कर सकता है।

जापान भारत को रक्षा उपकरण और उत्पादन तकनीक देने पर राजी हो गया है। सिविल न्यूक्लियर डील और रक्षा समझौते आपसी संबंधों में गरमाहट के प्रतीक हैं जो आपसी विश्वास और हितों की नींव पर हैं। भारत और जापान दोनों गणतंत्र हैं, दोनों के नेता राष्ट्रवादी विचारधारा के हैं, दोनों एशिया की बड़ी आर्थिक शक्ति हैं। पिछले वर्ष प्रधानमंत्री मोदी ने जापान के साथ एक विशेष समझौते-स्पेशल स्ट्रेटेजिक ग्लोबल पार्टनर्शिप पर हस्ताक्षर किये थे जो दोनों देशों को तेजी से करीब लाई है।

दोनों देशों ने भारत-जापान विजन 2025 पर हस्ताक्षर किये जिसका उद्देश्य है – इन्डो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति और विकास के लिए मिलकर काम करना। दोनों देशों का मानना है कि साउथ चाइना सी के उपर उड़ान भरने और समुद्र में नैविगेशन की आजादी सभी देशों के लिए निर्बाध होनी चाहिए। दोनों देश इस संबंध में बराबर एक-दूसरे के सम्पर्क में रहेंगे।

भारत और जापान के बीच व्यापार और निवेश में भी बढ़ोत्तरी आ रही है। जापान ने हाल के वर्षों में जिन प्रोजेक्टस के लिए आर्थिक और तकनीकी सहायता दी है उनमें प्रमुख हैं—दिल्ली मुबंई इंडस्ट्रियल कारिडोर, रेलों की आधुनिकीकरण और तीव्र गति से चलने वाली रेल व्यवस्था एम. आर. टी., मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन और ऊर्जा के क्षेत्र में विकास आदि।

दोनों देशों में मुक्त व्यापार का समझौता है। भारत में जापानी कंपनियां वैसे ही उत्पादन और व्यापार कर सकती हैं जैसे स्वदेशी कंपनियां। भारत से जापान निर्यात होने वाली अधिकांश वस्तुएं अभी तक कृषि उत्पाद ही रही हैं जैसे—चाय, मसाले, फल, बासमती चावल, खाने के तेल और कुछ औद्योगिक पदार्थ। जिन वस्तुओं के निर्यात की संभावना बढ़ी है उनमें फार्मासोकिल, पेट्रोकेमिकल, सूती और रेशमी वस्त्र, सिंथेटिक पार्न और ज्वेलरी आदि हैं। भारत की सॉफ्टवेयर और सेवा क्षेत्र की कंपनियों को जापान में व्यापार करने की सुविधाएं बढ़ी हैं।

जापानी कंपनियां बड़े पैमाने पर भारत में निवेश कर रही हैं। चीन की तुलना में जापान का व्यापार भारत में कम है किन्तु जापान का पूँजी निवेश तेजी से हो रहा है। अधिकांश निवेश औद्योगिक उत्पादन बढ़ाने, तकनीकी ट्रांसफर और आधारभूत ढ़ांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) के लिए होगा। जापानी निवेश मोदी के “मेक इन इंडिया” के सपने को साकार करने में सहायक सिद्ध हो सकता है। इसके विपरीत चीन जो भारत का दूसरे नंबर का सबसे बड़ा साझेदार है। वह सस्ते दर में भारत के बाजारों को पाटने में लगा है जिसके फलस्वरुप लघु और मध्यम श्रेणी के व्यावसायिक और औद्योगिक प्रतिष्ठान लाखों की संख्या में बंद हो गए और बेरोजगारी बढ़ी।

दीवाली, दुर्गा पूजा और अन्य त्यौहारों पर अरबों रुपये के चीन का माल भारत के बाजारों में बिकते हैं जिनकी वजह से घरेलू उद्योंगों को भारी धक्का लगा है। बड़े पैमाने पर उपभोक्ता पदार्थ, मशीने, इलेक्ट्रॉनिक गुड्स आदि चीन से भारत में आयात हो रहे हैं फलस्वरुप भारत की चीन को देनदारी तेजी से बढ़ी है। चीन भारत में पूँजी निवेश में दिलचस्पी नहीं ले रहा है, वह अपना व्यापार बढ़ाने पर केन्द्रित है जबकि भारत को आर्थिक विकास के लिए पूँजी और तकनीक की आवश्यकता है।

जापान के साथ भारत के आर्थिक संबंधों की गरमाहट चीन को भाती नहीं है। जापान और भारत के रिश्तों में गरमाहट को लेकर चीन के एक सरकारी अखबार ने हाल ही में जो टिप्पणी की है वह चीन की बौखलाहट का स्पष्ट संकेत देती है। अखबार ने कहा है कि इस संबंध की नींव अनिश्चितता पर निर्भर है। जापान भारत को अपनी ओर खींचने के लिए चीन का प्रभाव कम करने, उसका कद छोटा करने की कोशिश कर रहा है जो संभव नहीं है क्योंकि नरेन्द्र मोदी की सरकार सतर्क है। भारत चीन के साथ अपने आपसी संबंधों में संतुलन बनाए रखेगी।

बुलेट ट्रेन का कांट्रेक्ट चीन की जगह जापान को देना भी चीन सरकार की आंखों में किरकिरी का कारण बना है। ज्ञातव्य है कुछ महीनों पूर्व ही चीन सरकार के प्रधानमंत्री ने ब्रिक्स सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी से एशिया के पैसिफिक देशों के शीर्ष सम्मेलन में सीमा विवाद और आर्थिक सहयोग के मुद्दों पर बात किया था। हाल ही में जापानी प्रधानमंत्री के भारत यात्रा और कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर से चीन की प्रतिक्रिया तीव्र हुई है जो भारत को चेतावनी देने वाली दिखी।

चीन अपनी विस्तारवादी नीति से अपने अधिकांश पड़ोसियों को आतंकित कर रहा है। दक्षिण चीन सीमा पर उसके अधिकतर पड़ोसी चिंतित हैं—वियतनाम, फिलीपींस, साउथ कोरिया, जापान आदि। समुद्र तटवर्ती देशों में चीन तेल की खुदाई का स्वामित्व अपना मानता है। समुद्र में नैविगेशन को अपने नियंत्रण में रखना चाहता है। यहां तक कि समुद्र के उपर उड़ान को भी बांधित कर रहा है। जापान के कुछ द्वीपों पर और समुद्र तट के अन्य देशों की सीमा क्षेत्र के इलाकों को अपने देश का हिस्सा मानता है जैसे– भारत के अरुणाचल प्रदेश को अपना कहता है। कई छोटे देश चीन के भय से खुलकर विरोध नहीं कर पाते।

जापान दुनिया की बड़ी आर्थिक शक्ति है। द्वितीय विश्व युद्ध के पूर्व बड़ी सैन्य शक्ति था किन्तु हिरोशिमा और नागासाकी पर अमेरिकी बमबारी और युद्ध में पराजय ने उसकी प्रभुता पर भारी ठेंस पहुँचाया। बाद में अमेरिकी सहायता से जापान आर्थिक दृष्टि से उठ खड़ा हुआ और अपने बल पर विश्व की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति के रुप में उभरा। पिछले दो-तीन दशकों में जापान की अर्थव्यवस्था उतार पर थी जिसके फलस्वरुप वह चीन से पीछे हो गया। शिंजो अबी के नेतृत्व में जापान फिर उठ रहा है, आर्थिक और सैन्य शक्ति दोनों बढ़ा रहा है।

भारत से संबंध बढ़ाने में उसका राष्ट्रीय हित तो है ही, साथ में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने में भी। भारत स्वयं भी चीन की विस्तारवादी नीति से चिंतित है – सीमा पर आए दिन चीन सैनिकों की घुपपैठ, अरुणाचल पर दावा, पाकिस्तानी कब्जे में भारत की भूमि पर सड़क का निर्माण, पाकिस्तान को भारत के विरुद्ध सैन्य और आर्थिक सहायता आदि। भारत और जापान मिलकर अपने हितों की रक्षा कर सकते हैं, यह दोनों देश समझते है। चीन के साथ भी भारत अपने अच्छे संबंध बनाए रखना चाहता है और आगे भी रखेगा। इस संबंध में सरकारी चीन मीडिया की चेतावनी भरी प्रतिक्रिया अनावश्यक है।

(प्रो. लल्लन प्रसाद लेखक अर्थशास्त्र विभाग के पूर्व प्रमुख व डीन, दिल्ली विश्वविद्यालय और कौटिल्य फाउंडेशन के कार्यकारी अध्यक्ष हैं।)

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