होते ग़र राजीव गाँधी (Rajiv gandhi)आज

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गस्त 20 को राजीव गाँधी Rajiv Gandhi का जन्म दिन है। यदि वर्ष 1991 मई में उनकी निर्मम हत्या न होती तो वह इस वर्ष 73वर्ष के होते। राजीव गाँधी न तो बहुत कामयाब प्रधानमंत्री थे और न ही संगठन क्षमता के धनी पार्टी अध्यक्ष। यह बड़े पद उन्हें विरासत में मिले और वह भी तब जब उनका दायित्व निभाने के लिए वह तैयार नहीं थे। फिर भी राजीव गाँधी के न रहने के कारण कांग्रेस के नेतृत्व और देश की राजनीति में बहुत बड़ा निर्वात आया जिसका एहसास उनकी मृत्यु के 24 वर्ष बाद आज भी महसूस किया जा रहा है।

छोटे भाई संजय गाँधी की अचानक मृत्यु के कारण बड़े बेमन से वह राजनीति में आये। वर्ष 1982 में उन्होंने कांग्रेस के महासचिव का पद संभाला और वर्ष 1991 में वह अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए। प्रश्न यह है कि दस वर्ष से कम की अवधि में उन्होंने ऐसा क्या कर दिया जिसके कारण आज भी उनकी कमी महसूस की जाती है।

राजीव गाँधी Rajiv Gandhi ने न तो वर्तमान राजनीति के बारे में कोई अध्ययन किया था और न ही व किसी जन आंदोलन से जुड़े थे। प्रशासन की कला से वह पूर्णत अनभिज्ञ थे। लेकिन उनका सरल और सीधा स्वभाव तथा चारित्रिक ईमानदारी ने उनको जनमानस का प्रिय नेता बनाया था। लेकिन लोकप्रियता के शिखर पर पहुँच कर उनका इतनी जल्दी गमन क्यों हुआ यह एक बंद किताब है जो कि किसी दिन जरुर खुलेगी। अभी तो सिर्फ यह कहा जा सकता है कि उनकी राजनैतिक शैली कुछ राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय निहित स्वार्थों की जड़ों पर कुठाराघात कर रही थी और यह निहित स्वार्थ राजीव गाँधी को सत्ता से हटाना चाहते थें।

वर्ष 1991 का लोकसभा चुनाव अपने अंतिम चरण में था और यह लगभग तय था कि कांग्रेस सत्ता में आयेगी और राजीव गाँधी Rajiv Gandhi प्रधानमंत्री बनेंगे। जब वह चुनाव प्रचार के लिये तमिलनाडु जाने लगे (जो उनके जीवन की अंतिम यात्रा सिद्ध हुई) तो दिल्ली एयरपोर्ट पर उनको विदाई देने वाले एक कांग्रेसी नेता ने कहा कि बंधाई स्वीकार कीजिये अब तो हम लोग चुनाव जीतने वाले हैं और आप प्रधानमंत्री बननेवाले।

उन कांग्रेसी नेता के अनुसार राजीव गाँधी Rajiv Gandhi ने बड़ी संजीदगी से उससे कहा हां, वह तो ठीक है पर अमेरिकन्स काम करने दें तब तो । इसके बाद वह फिर कभी वापिस न आने के लिये चले गये।इन कांग्रेसी नेता ने मुझसे कहा कि मैं आजतक नहीं समझ पाया कि राजीव जी ने मुझसे यह क्यों कहा था।

अमेरिकी प्रशासन राजीव गाँधी Rajiv Gandhi से बहुत नाराज है यह तो तभी स्पष्ट हो गया था जब उन्होंने मैक्सिको में ब्रिटिश-अमेरिकी साम्राज्यवाद के विरुद्ध युद्ध का बिगुल फूंका था।क्या राजीव गाँधी का चरित्र हनन अंतर्राष्ट्रीय पूँजीवाद और भारतीय कार्पोरेट जगत की मिलीभगत द्वारा किया गया था।

भारतीय कार्पोरेट जगत नाराज था वित्तमंत्री राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा निजी औद्योगिक प्रतिष्ठानों पर आयकर तथा अन्य करों की चोरी के आरोपों की जांच के लिये डाले गये छापो के कारण। राजीव गाँधी Rajiv Gandhi पर दबाव था कि या तो वह वित्तमंत्री बदले या फिर यह छापे बंद करवाये।

कोई भी प्रधानमंत्री भारत जैसे बड़े देश के तमाम वर्गों के आर्थिक हितों और निहित स्वार्थों को संतुष्ट नहीं रख सकता। लेकिन जैसे-जैसे राजीव गाँधी Rajiv Gandhi की लोकप्रियता बढ़ती गयी यह राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय निहित स्वार्थ असहज होते गये। इससे भी बड़ी बात यह थी कि राजीव गाँधी के कारण यथास्थित टूट रही थी और देश का नेतृत्व एक ऐसे नये वर्ग के हाथ में जा रहा था जिसको अपने वश में करना व्यवस्था के लिये संभव नहीं था।

संघ परिवार भी राजीव गाँधी Rajiv Gandhi का प्रबल विरोधी था। एक कारण यह था कि संघ परिवार के और देश के व्यापारी वर्ग के हित आपस में जुड़े हुए हैं। यदि कार्पोरेट जगत राजीव गाँधी से नाराज था तो संघ परिवार कैसे मित्र हो सकता था। लेकिन इससे बड़ा कारण यह था कि 1977 में सत्ता का स्वाद चखने के बाद संघ परिवार फिर से सत्ता में आना चाहता था जो राजीव गाँधी जैसे लोकप्रिय कांग्रेस नेता के होते संभव न था। फिर यह भी बात थी कि राजीव गाँधी जिस तरह का आधुनिक भारत बनाना चाहते थे उसमें रुढ़िवादी साम्प्रदायिकता की कोई जगह नहीं थी। आरएसएस और मुस्लिम साम्प्रदायिक संगठनों के लिये वह अस्तित्व का संकट साबित हो रहे थे।

इस पृष्ठभूमि में राजीव विरोधी रणनीति बनाना आसान काम था। पहले यह कु-प्रचार किया गया कि उन्होंने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया है और उनका नाम राबर्ट गाँधी हो गया है। सोन्या गाँधी के ईसाई होने के कारण यह आथा थी कि बहुसंख्यक हिंदु जनमानस उनसे कट जायेगा पर जब यह कु-प्रचार सफल न हुआ तो उनकी मिस्टर क्लीन की छवि पर प्रश्नचिन्ह लगाया गया। विशवनाथ प्रताप सिंह की महत्वाकांक्षा जागृत की गयी। भगवान राम के वंशज देश के प्रधानमंत्री बनने के लिये सबसे उपयुक्त व्यक्ति थे और वह ही क्यों न बने एक विधर्मी के स्थान पर।

अपनी बंदूकों की जगह स्वीडन की बंदूकें खरीदने के फैसले से अमेरिका वैसे ही नाराज था। बस राजीव गाँधी के देशी और विदेशी विरोधियों ने रच डाली बोफोर्स की साजिश। ऐसा नहीं है कि राजीव गाँधी ने गलतियां नहीं की। अनुभवहीनता के कारण उन्होंने बहुतेरे गलत फैसले लिये। शायद उन्हें अंदाजा नहीं था कि उनके विरोधी कितने शातिर थे। वह आस्तीन के सांपों को नहीं पहचान पाये। प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने कुछ पत्रकारों से कहा कि जब लोकसभा में बोफोर्स का मुद्दा आया तो राजीव गाँधी ने खड़े होकर ऐलान कर दिया कि मैंने कोई कमीशन नहीं ली। इसकी कोई जरुरत नहीं थी। उन्हें एक समझदार राजनीतिज्ञ की तरह कहना चाहिये था कि हम इस मामले में जांच करायेंगे।

यह कहना बहुत मुश्किल है कि क्या यह तमाम राजीव विरोधी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय निहित स्वार्थ उनकी हत्या के षडयंत्र में भी शामिल थे। पर यह सही है कि राजीव गाँधी के जाने के बाद जो कुछ हुआ वह इन निहित स्वार्थों के हित में ही हुआ।

  • भूमंडलीकरण के नाम पर भारतीय अर्थव्यवस्था अमेरिकी अर्थव्यवस्था के इशारे पर चलने लगी।
  • भारत और इजराइल के पास आगे और अंतर्राष्ट्रीय नीति में भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति छोड़ दी।
  • देश में उदारीकरण के नाम पर कार्पोरेट जगत को खुली छूट मिली।
  • कर्मचारी तथा श्रमिक वर्ग के अधिकारों में कटौती हुई।
  • आर्थिक सुधारों के नाम पर सरकारी उपक्रम निजी हाथों में बेचे गये और पब्लिक सेक्टर को धीरे-धीरे समाप्त करने का प्रयास शुरु हो गया।

राजीव गाँधी Rajiv Gandhi की हत्या के अगले वर्ष राम जन्म भूमि का आंदोलन तेज हुआ और बावरी मस्जिद तोड़ दी गयी। देश की राजनीति का साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण हुआ। यह कांग्रेस विचारधारा को समाप्त करने का सफल प्रयास सिद्ध हुआ।

यदि राजीव गाँधी जीवित रहते तो शायद आज स्थित कुछ और होती।

( प्रो. प्रदीप के. माथुर लेखक वरिष्ठ संचार शिक्षाविद और पत्रकार हैं)  

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