भारत और इण्डिया के बीच सरकार खोद रही खाई

अम्बानीअडानी जैसे बड़े उद्योगपतियों के बैंक ऋण माफ किये जा रहे हैं और डिजिटल इण्डिया व स्टार्टअप जैसी लोकलुभावनी योजनाओं द्वारा पूंजीवादी वर्ग को और सुविधायें दी जा रही हैं। आमजनता के लिए सिर्फ नारेजुमले और अच्छे दिनों का आश्वासन के साथ राष्ट्रवाद का लुभावन नारा भर है।….

अम्बानीअडानी जैसे बड़े उद्योगपतियों के बैंक ऋण माफ किये जा रहे हैं और डिजिटल इण्डिया व स्टार्टअप जैसी लोकलुभावनी योजनाओं द्वारा पूंजीवादी वर्ग को और सुविधायें दी जा रही हैं। आमजनता के लिए सिर्फ नारेजुमले और अच्छे दिनों का आश्वासन के साथ राष्ट्रवाद का लुभावन नारा भर है।….

   पिछले कुछ वर्षों से देश के संपन्न व अभिजात्य वर्ग को इण्डिया और विपन्न, अशिक्षित तथा अर्द्धशिक्षित वर्ग को भारत कहा जाने लगा है। साथ ही साथ भारतीय जनता पार्टी की सरकार के सत्ता में आने के बाद ‘नवराष्ट्रवाद’ का जो दौर आया है उसमें भारत शब्द और भारतीय पर बहुत जोर दिया जा रहा है। कुछ लोगों द्वारा यह मांग भी उठाई जा रही है कि संविधान में संशोधन करके ‘इण्डिया’ शब्द को हटा दिया जाय और सिर्फ ‘भारत’ शब्द ही रहने दिया जाय।

पर विडम्बना यह है कि भारत और मां भारती की दिन-रात माला जपने वाली भाजपा और उसके संघ परिवार समर्थक अपने वर्ग चरित्र से वास्तव में इण्डिया के समर्थक हैं न कि भारत के। वह यथास्थिति के हामी हैं और समाज परिवर्तन की उस प्रक्रिया के कड़े विरोधी हैं जो भारत के जनतांत्रिक विकास के लिए अतिआवश्यक है। वह यह नहीं समझते कि हमारे देश के पिछड़ेपन और गरीबी का मूल कारण सामंतवादी मनोवृति है जिसका अंत किये बिना उस यथस्थिति को तोड़ना असंभव है जो भारत के विकास में सबसे बड़ी अड़चन है।

उदारतावादी अर्थव्यवस्था और उपभोक्तावाद की चमक-दमक में हम सब यह बात भूल सी गये हैं कि केवल अर्थव्यवस्था की बढ़ती दर ही काफी नहीं है बल्कि देश को आगे बढ़ाने के लिए सहभागी विकास भी आवश्यक है और इस विकास के लिए सरकारी योजनाओं से भी अधिक आवश्यक है हमारे नजरिये के बदलाव। लेकिन दुःख की बात है कि जैसे-जैसे देश का आर्थिक विकास हो रहा है वैसे-वैसे ही हमारा दृष्टिकोण संकीर्ण होता जा रहा है और हम स्वार्थी तथा आत्मकेन्द्रित होते जा रहे हैं। समाज के संपन्न वर्ग से मानवता, निःस्वार्थ सेवा और त्याग जैसे विचार दूर होते जा रहे हैं। यदि बहुश्रुत अभिव्यक्ति का उपयोग किया जाये तो ‘इण्डिया’ और ‘भारत’ के बीच दूरी बढ़ती जा रही है।

प्रश्न यह है कि ऐसा क्यों हो रहा है और इसको रोकना क्यों आवश्यक है। अच्छा पैसा कमाना और आधुनिक साधनों की सहायता से सुविधापूर्ण जीवन जीना सामान्य मनोवृत्ति है। अमेरिका और भारत समेत तमाम देशों में सामाजिक शोध और समाजशास्त्री अध्ययनों के दौरान यह बात सामने आयी कि बहुसंख्यक अर्द्धशिक्षित और शिक्षित निम्न मध्य वर्ग अपने जीवन से बराबर असन्तुष्ट रहता है और अपनी जीवनशैली को बड़े और संपन्न वर्ग के ढर्रे पर लाना चाहता है। लेकिन सबसे बड़ी बात जो सामने आयी वह यह है कि समृद्धि आने पर वह अपने को निम्न मध्यमवर्ग से काट लेता है तथा अपने मूल वर्ग के लिए उसकी भावना भी समाप्त हो जाती है। अमेरिका में जब पहले उभरते हुए काले वर्ग के लोगों को इस आशा से विकसित किया गया कि वह अपने समुदाय को नेतृत्व देंगे तो पाया गया कि शिक्षित व संपन्न होने के बाद वह काले लोगों के लिए ही वही उपेक्षा का भाव रखने लगे जो वहां गोरे लोगों का था। भारत में भी दलित वर्ग के लोगों में यह मनोवृत्ति देखी जा रही है। पिछड़ा वर्ग के क्रीमीलेयर की बात भी कुछ इसी तरह की है। अल्पसंख्यकों, विशेषतः मुस्लिम अल्पसंख्यक वर्ग भी अपने रहनुमाओं की इसी तरह की स्वार्थी मनोवृत्ति का शिकार है।

संविधान के अनुसार कार्य करते हुए देश की सरकार और उसके नेताओं का उत्तरदायित्व देश की समस्त जनता के लिए विकास कराना है न कि कुछ विशेष वर्गों या वर्गों के नेताओं के लिए। एक तो लम्बे समय से पिछड़े हमारे विशाल समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक विकास की बात पहुंचाना वैसे भी दुष्कर कार्य है और फिर जब ऐसा करने की मनोवृत्ति न हो तो यह कार्य पूरी तरह से असंभव हो जाता है। आज ‘भारत’ और ‘इण्डिया’ के बीच बढ़ती दूरी इसी इच्छा शक्ति का अभाव दर्शाती है।

लगभग दो वर्ष पहले अपने चुनाव प्रचार और फिर प्रधानमंत्री के पद पर आसीन होने के बाद नरेन्द्र मोदी ने ‘सबका साथ-सबका विकास’ का नारा दिया था। आज भी अक्सर वह अपने भाषणों में इसका जिक्र करते हैं। पर क्या वास्तव में उनकी सरकार इस वादे पर अमल कर रही है? सच तो यह है कि पिछले दो वर्षों में देश में वर्ग विभेद और वर्ग संघर्ष और भी बढ़ा है तथा सामंजस्य और सहिष्णुता की भावना में कमी आयी है। संघ परिवार के ‘नवराष्ट्रवाद’ की आक्रमक नीति न सिर्फ अल्पसंख्यकों बल्कि बहुसंख्यकों के प्रगतिशील वर्गों के साथ भी टकराव की स्थिति पैदा कर रही है। जैसे-जैसे मोदी सरकार का विरोध बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे ही मोदी भक्तों की आक्रामकता में वृद्धि आयी है। हैदाराबाद के दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या का मामला हो या दिल्ली के जे.एन.यू. में तथाकथित राष्ट्र विरोधी नारेबाजी की बात हो, यह आक्रामकता अपने नये रूप में सामने आ रही है। इसका सीधा कारण उनका इस विचारधारा में विश्वास है कि जो सामाजिक यथास्थिति की पोषक और सामन्तवाद की समर्थक है।

बात सीधी व साफ है कि पिछले 60-65 वर्षों में होने वाले तमाम चुनावों के बाद भी हमारा नजरिया लोकतांत्रिक नहीं हुआ है। शायद 2000 वर्ष की जातिवादी व्यवस्था ने हमारे अन्दर से यह भाव समाप्त कर दिया है कि सब मानव मात्र एक समान हैं। ऊंच-नीच और छोटे-बड़े के भाव हमारी मानसिकता का आवश्यक अंग बन गये हैं और इसके कारण दूसरे वर्ग या जाति के प्रति हुए अन्याय से हमारी चेतना आहत नहीं होती।

समग्र विकास के मार्ग में आने वाली इस मानसिकता से मुक्ति पाना हमारी प्राथमिक आवश्यकता है। पर भाजपा सरकार ने जाने अनजाने इस मानसिकता को और भी बढ़ावा दिया है। यह स्पष्ट है कि वर्ग विभेद की जड़ें जातिवादी मानसिकता है। यह मानसिकता उस यथा स्थिति की पोषक है जिसमें अमीर गरीब, छोटे-बड़े, अपने-पराये और नौकर-मालिक के भेदभाव निहित है। इसी यथास्थिति ने देश की हिन्दू जनता में अल्पसंख्यक सवर्ण वर्ग को बहुसंख्यक मध्यम जातीय, दलित और जनजातीय वर्ग पर शासन करने और उन्हें शोषित करने का निर्बाध अधिकार दिया हुआ है।

पुरानी संस्कृति और नवराष्ट्रवाद के अतार्किक और अबौद्धिक नारे और उनसे सृजित राजनीतिक चेतना देश में ऐसा वातावरण बना रही है जिसमें शोषण और अन्याय पर आधारित इस यथास्थिति को बल मिल रहा है और उसको तोड़ने का प्रयास करने वाले लोग समाज और देश के दुश्मन समझे जा रहे हैं। इसलिए आज सत्तारूढ़ भाजपा और उसके नेता कुछ भी कहे लेकिन वह व्यापक जनहित में काम न करके संपन्न और साधनयुक्त वर्गों का ही हित साधन कर रहे हैं। हमारी अर्थव्यवस्था की दिशा भी भाजपा द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था के निहित स्वार्थों का वर्चस्व स्थापित कर रही है। अंबानी, अडानी जैसे बड़े उद्योगपतियों के बैंक ऋण माफ किये जा रहे हैं और डिजिटल इण्डिया व स्टार्टअप जैसी लोकलुभावनी योजनाओं द्वारा पूंजीवादी वर्ग को और सुविधायें दी जा रहीं हैं। आम जनता के लिए सिर्फ नारे, जुमले और अच्छे दिनों का आश्वासन ही है। महंगाई बढ़ रही है और निर्यात गिरने के कारण बेरोजगारी भी बढ़ी है साथ ही आज अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में रूपये अपने 30 माह में न्यूनतम स्तर पर है पर आंकड़ों की जादूगरी करके आम जनता को विश्वास दिलाया जा रहा है कि देश का विकास हो रहा है।

संपन्न इण्डिया और विपन्न भारत के बीच की दूरी बढ़ रही है और मजे की बात यह है कि इसके बढ़ाने वाली सरकार और उसके समर्थक इण्डिया को बुरा भला कहते हैं और भारत का दम भरते हैं।

संदीप कुमार सिंह(लेखक हिंदी पत्रकारिता के शोधकर्ता है)

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