नैरोबी के बाद का सफर

सच है कि विकासशील देश खली हाथ लौटे पर नैरोबी के घोषणा-पत्र से साफ है कि शेष वार्ताओं के बारे में सभी सदस्य देश वचनबद्ध हैं, कि कृषिगैर कृषि बाजार पहुँचसेवाएंविकास, ‘ट्रिप्सऔर नियम पर बात आगे भी जारी रहेगी।

विश्व व्यापार संगठन के 10वें नैरोबी (केन्या) मंत्रीस्तरीय सम्मेलन के अंत में जारी घोषणा पत्र पर भारत की वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमण की सबसे पहली टिप्पणी यह थी कि वे दोहा विकास चक्र के पुनः नवीनीकरण न होने से घोर निराशा में हैं। अमरीकी और यूरोपीय मीडिया ने घोषणा-पत्र में दोहा विकास वार्ता के ‘अंत’ को अमरीका और यूरोप के वार्ताकारों की सफलता के रूप में प्रचारित किया और यह कहा कि दोहा चक्र की मौत के बाद विश्व व्यापार संगठन को एक नए तरीके से चलाने और उसमें और नए मुद्दे जोड़ने के लिए रास्ता खुल गया है। भारतीय मीडिया ने भी नैरोबी घोषणा पत्र को पश्चिम के नजरिए से ही देखा और यह मान लिया कि भारत, चीन और अन्य विकासशील देशों की इच्छा और हितों खिलाफ अब दोहा विकास वार्ताओं का कोई भविष्य नहीं है और नए मुद्दों के लिए रास्ता खुल गया है और पूर्व की भांति विकसित देश अपनी मनमर्जी से अपने मुद्दों को आगे बढ़ाने में काम करेंगे।

क्या हैं दोहा विकास वार्ताएं?

भारत विश्व व्यापार संगठन की वार्ताओं के बाद 1994 में होने वाले समझौतों पर हस्ताक्षर करने वाले पहले देशों में से एक था। लेकिन वार्ताओं के कुछ मुद्दे ऐसे थे, जिन पर सहमति नहीं बन पाई थी। इन बचे हुए मुद्दों और विकासशील देशों की चिंताओं के मद्देनजर विश्व व्यापार संगठन के दोहा सम्मेलन 2001 के बाद,व्यापार सुविधाओं संबंधी नियम दोहा दौर की वार्ता में चल रही हैं। दोहा वार्तायें कृषि, गैर कृषि उत्पादों की बाजार पहुँच, व्यापार संबंधी बौद्धिक संपदा अधिकारों (एंटी डंपिंग और सब्सिडी सहित) इत्यादि के बारे में हैं। विश्व व्यापार संगठन में वचन के मुताबिक विकसित देशों को अपने कृषि सब्सिडी को कम करना था। लेकिन कृषि सब्सिडी को घटाने के बजाय उन्होंने कई गुणा बढ़ा दिया और विश्व व्यापार संगठन के नियमों से बचने के लिए उसे ग्रीन बॉक्स में वर्गीकृत कर दिया, जिसे घटाने की कोई प्रतिबद्धता नहीं थी। ऐसा माना जाता है कि यदि भारत विकसित देशों के कृषि उत्पादों को अपने देश में बाजार पहुँच प्रदान करता है तो हमारी कृषि पर भयंकर असर पड़ सकता है। तमाम विवादों के चलते, विश्व व्यापार संगठन की वार्ताओं में जो गतिरोध आया उसे समाप्त करने के लिए दोहा विकास वार्ताओं को खासा महत्व दिया गया, लेकिन विकसित देश चालाकी से इन मुद्दों को टालते रहे।

अब यह स्पष्ट हो चुका है कि किसी भी मुद्दे पर विकसित देश समाधान नहीं देना चाहते थे। उनको इस बात से कोई मतलब नहीं कि भारत का किसान सही कीमत न मिलने के कारण आत्महत्या कर रहा है। जबकि भुखमरी से पीड़ित दुनिया के25 प्रतिशत लोग भारत में रहते हैं और उनकी खाद्य सुरक्षा के लिए भारत सरकार जो प्रयास कर रही है, उस पर उनकी आपत्ति है। भारत सरकार जो आयात की बाढ़ रोकने के लिए पहले से ही विशेष बचाव उपाय (एसएसएम) अपनाने के रूप में पहले से ही उपलब्ध अधिकार पर समाधान चाहती थी, उस पर भी वे सहमति देने के लिए तैयार नहीं थे। तिस पर वे चाहते थे कि उन्हें भारत को अपने कृषि उत्पादों के निर्बाध निर्यातों की अनुमति मिल जाए। इसके साथ ही साथ वे भारत से होने वाले निर्यातों पर श्रम मानक और पर्यावरण मानक तो लादना चाहते ही थे, साथ ही साथ वे ई-कॉमर्स को भी व्यापार वार्ताओं के अंतर्गत शामिल करना चाहते थे।

नैरोबी के बाद क्या?

यह सही है कि नैरोबी मंत्री स्तरीय सम्मेलन से विकासशील देश खाली हाथ लौट गए और विकसित देशों ने भरपूर प्रयास भी किया और कुछ हद तक इस बात में सफलता भी पाई कि दोहा विकास वार्ताएं आगे न बढ़ पाएं। लेकिन इसका मतलब कतई नहीं है कि दोहा विकास वार्ताओं की संभावना पूरी तरह से समाप्त हो गई है और विकसित देश अपने अन्य मुद्दों को आगे बढ़ाने में पूरी तरह से सफल हो गए हैं। नैरोबी सम्मेलन की अध्यक्षा केन्या की वाणिज्य मंत्री अमीना मोहम्मद ने सम्मेलन के बाद आयोजित अपनी प्रेस वार्ता में इस बात को पूरी तरह से नकार दिया कि दोहा चक्र समाप्त हो गया है और अब नए मुद्दें लाए जा सकते हैं, बल्कि उन्होंने कहा कि घोषणा-पत्र में साफ-साफ लिखा है कि बचे हुए दोहा मुद्दों पर वार्ता पर सभी सदस्य वचनबद्ध हैं, जिसमें बचे हुए सभी दोहा मुद्दों जैसे, कृषि, गैर कृषि बाजार पहुँच, सेवाएं, विकास, ‘ट्रिप्स’ और नियम सभी शामिल हैं। भविष्य के एजेंडा में यह सभी महत्वपूर्ण भूमिका रखेंगे।

गलती बालीसे हुई शुरू

गौरतलब है कि विश्व व्यापार संगठन के बाली में आयोजित 9वें मंत्री स्तरीय सम्मेलन में भारत और अन्य विकासशील देशों ने बाकी मुद्दों से अलग व्यापार सुविधा समझौते पर अपनी सहमति दे दी और 2014 में जेनेवा में इसे विश्व व्यापार संगठन के भाग-1ए में शामिल करने पर भी अपनी सहमति दे दी, जबकि अन्य मुद्दे अभी भी सुलझे नहीं थे। चूंकि व्यापार सुविधा समझौता विकसित देशों के मन-मुताबित था, ऐसे में अन्य मुद्दों के साथ इसे जोड़कर, सौदेबाजी में अन्य मुद्दों को भी सुलझाया जा सकता था। इसलिए विकसशील देशों के पास एक महत्वपूर्ण मौका यूं ही गंवा दिया गया।

उधर भारत और चीन ने पांच राष्ट्रों की ग्रीन रूम चर्चा में भाग लेते हुए, अमरीका और यूरोप जिन्हें कुछ विकासशील देशों जैसे ब्राजील, केन्या, इंडोनेशिया और विश्व व्यापार संगठन के डायरेक्टर जनरल का समर्थन था, द्वारा अमरीका और यूरोप को किसी भी प्रकार की रियायत देने से मना कर दिया जाना चाहिए था। ऐसे में जब भारत, चीन और बड़ी संख्या में अफ्रीका के देश एकजुट थे, तो यह आसानी से हो सकता था। अभी भी मौका है कि भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका एकजुट हो जाएं और एशिया और अफ्रीका के अन्य विकासशील देशों को यूरोप और अमरीका की नव व्यापारवादी प्रवृति के प्रति जागरूक करें और दोहा विकास वार्ताओं को दुबारा विश्व व्यापार संगठन के पटल पर आ खड़ा करें। किसी भी हालत में नए मुद्दों को अध्ययन हेतु अथवा जनरल काउंसिल के एजेंडा पर लाने हेतु सहमति न हो पाए यह सुनिश्चित करना होगा। ध्यान रखना होगा कि जबतक आम सहमति नहीं होती मुद्दों को रोका जा सकता है, जैसा नैरोबी घोषणा-पत्र के पैरा 34 में साफ-साफ लिखा है। उनको इस झांसे में कतई नहीं आना है कि नए मुद्दे मान लेने पर उनके मुद्दे सुलझ जायेंगे। अभी तक विकासशील देशों ने मराकश समझौते के बाद भारी कीमत चुकाई है, उन्हें और अधिक कीमत नहीं चुकानी है।

हालांकि व्यापार सुविधा समझौते के फायदों पर बहुत चर्चा हो रही है और यह कहा जा रहा है कि सभी देश इसे सहमति दे दें, ताकि इसे प्रभाव में लाया जा सके। लेकिन हमें याद रखना होगा कि व्यापार सुविधा समझौते को लागू करने के लिए अभी काफी देशों की सहमति बाकी है, यदि बड़ी संख्या में देश अपनी सहमति को रोक कर विकसित देशों पर यह दबाव बनाए कि उनकी मांगों को पहले माना जाए। याद रखना होगा कि एशिया के देश हों या अफ्रीका के, अमरीका और यूरोप के भारी सब्सिडी के चलते उनके पास अपने कृषि उत्पादों के निर्यात को बढ़ाने की कोई संभावना नहीं है। इसलिए अमरीका और यूरोप की विश्व व्यापार संगठन में किसी भी बात मानने से उन्हें पहले से और ज्यादा नुकसान होगा।

(डॉ. अश्विनी महाजन लेखक एसोसिएट प्रोफेसरपीजीडीएवी कालेजदिल्ली विश्वविद्यालय)

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