हमारी नीतियों ने न्योता है आतंक को

विश्व की दूसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश भारत को विश्व के 55 से अधिक मुस्लिम राष्ट्रों का नेतृत्व करने का स्वाभाविक अधिकार है। पर हमने अपने संकीर्ण नजरिये के कारण इस अधिकार न तो सिर्फ गंवाया बल्कि इसे पाकिस्तान जैसे एक इतिहास-विहीन देश को दे दिया जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद की षड़यंत्रकारी कूटनीति के कारण अस्तित्व में आया। इसी अबौद्धिक और अंध मुस्लिम द्वेष के कारण हमने इजराइल से भी निकट संबंध बनाये। इसने पाकिस्तान और एक अवसर दिया भारत को पश्चिम एशिया के मुस्लिम राष्ट्रों से दूर करने का।

दुर्भाग्य से आतंकवाद हमारे युग का अभिशाप है। आशा थी कि सूचना तकनीकी के अभूतपूर्व विकास से ज्ञान का प्रकाश विश्व के हर कोने में फैलेगा और मानव समाज में तार्किक समझ तथा सहिष्णुता आयेगी। जब हम कामना कर रहे थे कि मानवता उच्चतम मूल्यों की तरफ अग्रसर होगी आतंकवाद ने उसको अज्ञान, पूर्वाग्रह, अनुभूति और व्यवहार के निम्नतर स्तर पर ला दिया है।

अकेला भारत ही नहीं है जो आतंकवाद की समस्या से जूझ रहा है। अमेरिका, रूस और चीन जैसे बड़े देश आतंकवाद के शिकार है। यूरोप और पश्चिमी एशिया के देशों में आज सार्वजनिक जीवन की सबसे बड़ी समस्या ही आतंकवाद है जिसमें अमूल्य मानवीय जीवन के साथ-साथ अकूत धन और संसाधन नष्ट हो रहे हैं। आज विश्व में गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा और कुपोषण को दूर करने के मार्ग में सबसे बड़ी बांधा आतंकवाद है जिसके कारण संसाधनों को मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति पर व्यय करने के स्थान पर हथियारों और सुरक्षा व्यय करना पड़ रहा है।

छोटी बड़ी आतंकवादी घटनाएं तमाम देशों में अकसर हो रही हैं। पिछले दिनों पेरिस में बहुत बड़ी आतंकी घटना हुई जिसमें बड़ी संख्या में निर्दोष व्यक्ति मारे गए और उस पर फ्रांसीसी सरकार ने सख्त कार्यवाही की। पर हमारे देश में किसी आतंकवादी घटना के बाद जो प्रतिक्रिया देखने में आती है वह बहुत बचकानी और हताशापूर्ण होती है। आवश्यकता है कि आतंकवादी घटनाओं से निपटने के लिये एक गंभीर और सुदृढ़ तरीका अपनाएं जैसा विश्व के अन्य बड़े देश करते हैं।

किसी आतंकवादी आक्रमण के बाद आत्मपरीक्षण, आत्मग्लानि और सरकार या सुरक्षा बल की खामियां दिखाने से कहीं अच्छा है कि हम अपने सुरक्षाबलों और समाज को आतंकवाद का सामना करने के लिए प्रशिक्षित करें और मानसिक रुप से तैयार करें। यह स्पष्ट है कि भारत में आतंकवादी आक्रमणों के पीछे पाकिस्तान का प्रत्यक्ष या परोक्ष हाथ होता है। पाकिस्तान ऐसा क्यों करता है, वहाँ सैनिक संस्थान और लोकतांत्रिक शासन में कैसा तकरार है, वह भारत के विरुद्ध आग उगलने वाले लोगों को क्यों नहीं गिरफ्तार करता तथा उसको आतंकवाद का समर्थन देने के लिए किस तरह जबाव दिया जाए, ऐसे मुद्दे हैं जिन पर चर्चा होनी शुरु हो जाती है। इस चर्चा का न कोई लाभ होता है न ही निष्कर्ष निकलता है। फिर भी पिछले 15 वर्षों से हम लगातार इन निरर्थक बातों पर अपनी ऊर्जा और समय नष्ट कर रहे हैं।

पाकिस्तान को इन नापाक हरकतों से रोकने का कोई तरीका समझ में नहीं आता है। पाकिस्तान या तो यह कहता है कि आतंकवादी पाकिस्तानी न होकर अपनी आजादी के लिए लड़ने वाले कश्मीरी नौजवान है, या कहता है कि आतंकवादी वह पाकिस्तानी नागरिक तो जरूर है पर उनका पाकिस्तानी सरकार या किसी सरकारी संस्था (जिसमें पाकिस्तानी फौज भी शामिल है) से कुछ लेना-देना नहीं है। पाकिस्तान के अनुसार यह वह पाकिस्तानी है जो अपने मतावलम्बी यानी मुसलमानों के दमन के विरुद्ध लड़ रहे हैं जो उनके अनुसार कश्मीर तथा भारत में आये दिन होता है। आशय यह है कि यदि कश्मीर समस्या का समाधान हो जाये और भारत में कथित मुस्लिम दमन न हो तो आतंकवाद अपने आप समाप्त हो जायेगा।

स्पष्ट है कि पाकिस्तान, विशेषतः पाकिस्तानी सेना और उसकी गुप्तचर सेवा इस तर्क की बिना पर भारत में आतंकवाद को अपने घर में रोकने की किसी भी जिम्मेदारी से बचना चाहते हैं। हम कुछ भी कहें लेकिन विश्व के तमाम राष्ट्र कश्मीर को एक सुलझा हुआ मसला मानते हैं और उन्हें लगता है कि कश्मीर में भारतीय सैन्य बलों का भारी संख्या में होने का मतलब ही कश्मीरी जनता का दमन करना है।

पाकिस्तान के यह दोनों आरोप गलत हैं। भारत न कश्मीरी जनता का दमन करता है और न ही भारतीय मुसलमानों का। पर हम अपनी मूढता, संकुचित सोच और तमाम मुस्लिम विरोधी साम्प्रदायिक तत्वों के कारण इस तरह के संकेत देते हैं जिससे पाकिस्तानी चालबाजी सफल हो जाती है। आज मोदी सरकार पिछले 18 महीनों के शासन में दो बड़ी आतंकवादी वारदातों के बाद सुरक्षात्मक रूख पर हैं। पर जब भाजपा केन्द्र में सत्ता में नहीं थी तब नरेन्द्र मोदी ही पाकिस्तान के विरुद्ध दिन-रात भड़काऊ भाषण देते रहते थे और उसके पीछे उनका मुस्लिम द्वेष साफ झलकता था।

बिना भारत की जनसंख्या के विभिन्न वर्गों की सामाजिक-आर्थिक स्थित का आकलन करते हुए वर्षों भाजपा और संघ परिवार के नेता केन्द्र की सरकार पर मुस्लिम तुष्टीकरण का बेहूदा आरोप लगाते रहे हैं। साम्प्रदायिक सौहार्द की बात करने वालों का न सिर्फ उन्होंने मजाक उड़ाया बल्कि उन्हें राष्ट्रविरोधी भी करार कर दिया जो बिल्कुल नासमझी वाली बात थी। उन्हें इस बात को कतई भी नहीं समझा कि इसका लाभ हमारा विरोधी देश कैसे उठा रहा है।

विश्व की दूसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश भारत को विश्व के 55 से अधिक मुस्लिम राष्ट्रों का नेतृत्व करने का स्वाभाविक अधिकार है। पर हमने अपने संकीर्णॅ नजरिये के कारण इस अधिकार न तो सिर्फ गवाया बल्कि पाकिस्तान जैसे एक इतिहास-विहीन देश को दे दिया जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद की षड़यंत्रकारी कूटनीति के कारण अस्तित्व में आया। इसी अबौद्धिक और अंध मुस्लिम द्वेष के कारण हमने इजराइल से भी निकट संबंध बनाये। इसने पाकिस्तान और एक अवसर दिया भारत को पश्चिम एशिया के मुस्लिम राष्ट्रों से दूर करने का।

आज हम ही नहीं सारा विश्व जानता है कि पाकिस्तान वह देश है जहाँ आतंकवाद फलता-फूलता है। सारी दुनिया के सामने झूठ बोलकर पाकिस्तान की सेना ने अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को अपने संरक्षण में छिपाकर रखा। अमेरिका के रक्षा विश्लेषकों ने गहरे अध्ययन और लंबे अनुभव के बाद कई पुस्तकें लिखी हैं जिसमें उन्होंने लश्करे-ए-तैयबा और जैश-ए-मुहम्मद के आतंकवादी चरित्र तथा पाकिस्तानी सरकारी संस्थाओं से उनके करीबी संबंधों को उजागर किया है।

समस्या यह है कि हम अपनी नीतिगत कमजोरियों के कारण अपने को पाकिस्तानी आतंकवाद का समुचित उत्तर देने में अक्षम पाते हैं। सबसे पहले तो हमें अपनी सुरक्षा इतनी मजबूत बनानी होगी जिससे न सीमा पार से आतंकी आ सकें और न ही वह कोई नुकसान कर सकें। भारत जैसे बड़े और शक्तिशाली देश के लिये यह हास्यास्पद है कि वह पाकिस्तान से सीमा पर से होने वाले आतंकवाद पर लगाम कसने के लिये कहे जबकि पाकिस्तान खुद भी आतंकवाद का शिकार है।

यह साफ है कि न हम पाकिस्तान से जमीनी युद्ध कर सकते हैं और न ही वहाँ चल रहे आतंकी कैम्पों पर वायु सेना द्वारा आक्रमण कर सकते हैं। ऐसा करना आणविक युद्ध को आमंत्रण देना होगा जिसकी विभीषिका में सारा भारतीय उपमहाद्वीप नष्ट हो जायेगा। इसलिये सशस्त्र संघर्ष की बात मन से निकाल कर हमको नीतिपरक आयामों के बारे में सोचना चाहिये। सबसे पहले हमें उन स्थितियों को ठीक करने पर ध्यान देना चाहिये जिनके रहते पाकिस्तान अपने को भारतीय मुसलमानों, विशेषतः कश्मीरियों का हित संरक्षक दिखाता है।

कश्मीर में प्रशासकीय सुधार, बेहतर प्रशासन, भ्रष्टाचार उन्मूलन, आर्थिक विकास तथा रोजगार बढ़ाने के प्रयास किये जाने चाहिये। साथ ही साथ राज्यको अपने प्रशासन के लिये अधिकार देने चाहिये औऱ केन्द्र को राज्य के मामले में दखल कम से कम करना चाहिये। सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी करके राज्य को अगर कुछ स्वायत्तता दी जाय तो कोई हर्ज नहीं होगा। इसी तरह मुस्लिम विरोधी बयानों पर भी पूर्ण रोक लगनी चाहिए। पर शायद सबसे महत्वपूर्ण बात अपना आत्मविश्वास विकसित करने की है।

स्पष्ट है कि एक संगठित और संवेदनशील समाज ही आतंकवाद जैसा खतरा झेलने की सक्षमता रख सकता है। अतः आवश्यक है कि उन सब शक्तियों पर रोक लगनी चाहिये जो जाने अनजाने समाज को जाति और धर्म के नाम पर विभाजित करने का काम करती है। अविश्वास औऱ पूर्वाग्रही मनोवृत्ति न सिर्फ समाज के लिये घातक है बल्कि यह देश को असुरक्षा की ओर भी ढ़केलती भी है।

प्रचार आतंकवाद की आक्सीजन है। इसलिये मीडिया को आतंकवादी घटनाओं की रिपोर्टिंग के लिये ऐसे नये मापदंड बनाने चाहिये जिससे समाज को बल मिले न कि समाज में डर व्याप्त हो। आतंकवाद के कवरेज में राजनैतिक द्वंद्व का कोई भी स्थान नहीं है और इसमें बेकार की बयानबाजी के स्थान पर मानवीय त्रासदी से जुड़े तमाम मुद्दों को प्राथमिकता देनी चाहिये। आतंकवाद समग्र समाज पर आक्रमण है और इसका मुकाबला एक संगठित और समग्र समाज ही कर सकता है।

(प्रो.प्रदीप के माथुर लेखक संचार शिक्षाविद और वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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