प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना: पहले से बेहतर पर अधूरी

फसल कटते समय उत्पादन आंकड़ों में इकट्ठा करने के लिए स्मार्टफोन और रिमोट सेलिंग के इस्तेमाल की बात भी नई योजना में है। पाले से फसल का नुकसान भी अब बीमा के अंदर होगा जो पहले नहीं था। नुकसान का आंकलन गांव को एक युनिट मानकर किया जाएगा पहले यह ब्लॉक और पंचायत के दायरे को रखकर किया जाता था। अब तक चल रही योजनाओं में सरकार ने अपनी जिम्मेदारी पूरी देय रकम तक नहीं रखी थी। निर्धारित प्रतिशत तक ही सरकार देती थी, नई योजना में पूरी क्षतिपूर्ति का वादा है। सब्सिडी पर कैप हटा दिया गया है। जो इस योजना को पहले से अधिक आकर्षित बना सकता है।

आजादी के 68 साल बाद भी भारतीय किसान असुरक्षित हैं। कभी अतिवृष्टि, कभी  बाढ़, कभी अनावृष्टि, कम वृष्टि और सूखा, कभी टिड्डियों का आक्रमण, कभी और अन्य प्राकृतिक प्रकोप फसल नष्ट होने के कारण बनते हैं। भारतीय संसद में सबसे अधिक संख्या उन सदस्यों की है जो किसानों द्वारा चुनकर भेजे जाते हैं किन्तु किसानों का हित उनकी प्राथमिकता नहीं होती अन्यथा वर्षों से किसानों द्वारा आत्महत्या के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता, गांवों से पलायन न करना पड़ता। फसल बीमा की ऐसी कोई योजना आज तक नहीं क्रियान्वित हुई जो किसान को प्राकृतिक आपदाओं से पूरी तरह सुरक्षित कर सकें। टुकड़ों में बंटी योजनाएं बनती-बिगड़ती रहीं, किसान कर्ज लेने और सरकार से सहायता मांगने के लिए मजबूर हैं। वर्ष 1972 में पहली योजना आई जो वर्ष 1985 में वापस ले ली गई। प्रीमियम बीमा राशि का जो जमा हुआ 1से 2 प्रतिशत था, जो भुगतान की गई वह 9 प्रतिशत करीब थी। सरकारी खजाने से इस बीच कुल देय राशि रूपये 184446 लाख था। योजना पूरी तरह सरकार द्वारा संचालित थी। कवरेज सीमित था, किसानों को लाभ कम हुआ सरकार ने खर्चा अधिक किया, योजना असफल हो गई। दूसरी योजना वर्ष 1985 में आई वह भी असफल रही। वर्ष 1997-98 में प्रयोग के रुप में एक और योजना आई जो एक वर्ष भी नहीं चली इसमें उत्पादन और आमदनी दोनों का बीमा था। वर्ष 1999-2000 में राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना आई जिसमें सभी खाद्यानों, तिलहन, बागवानी आदि के बीमें के प्रावधान थे, फसल नष्ट होने पर प्रारम्भ में 25 प्रतिशत क्षतिपूर्ति का वादा था, चुनी हुई एरियाज में योजना लागू की गई। कर्ज लेने वाले किसानों के लिए यह अनिवार्य था बांकी के लिए उनकी इच्छा पर। केन्द्र और राज्यों को आधा-आधा बोझ लेना था। कई राज्यों में योजना लागू ही नहीं हुई, जहाँ हुई वहां फसल नहीं हुई। वर्ष 2013 में सरकार एक नई योजना लेकर आई – राष्ट्रीय फसल बीमा योजना जिसमें राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना कुछ परिवर्तित रुप में, मौसम पर आधारित फसल बीमा योजना एवं नारियल पाम बीमा योजना को एकीकृत कर दिया गया। मोदी सरकार अब प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लेकर आई है जो पुरानी योजना से एक कदम आगे है किन्तु पांच वर्षों में 50 प्रतिशत खेती योग्य भूमि ही कवर कर पायेगी। देश के आधे किसान फिर भी इस लाभ से वंचित रहेंगे।

नई योजना में पुरानी योजना भी कुछ कमियों को दूर करने का वादा है, प्रीमियम घटाये जाने की बात भी है और कवरेज भी बढ़ाया जायेगा। पुरानी योजना में खेत में जल भराव, भूस्खलन, फसल की कटाई के बाद प्राकृतिक आपदा से खाद्यान नष्ट होने की स्थिति में क्षतिपूर्ति का प्रावधान नहीं था जो नई योजना में है। प्रीमियम के दरों में कुछ कमी की गई है। पहले रबी की फसल पर 2.5 से 3.5 प्रतिशत प्रीमियम था और खरीफ के लिए 1.5 प्रतिशत, नई योजना में ये दरें क्रमशः 1.5 प्रतिशत और 2 प्रतिशत रहेगी। व्यावसायिक फसलों के लिए 5 प्रतिशत का अधिमूल्य देना होगा।

नई बीमा योजना में देय राशि सीधे किसान के बैंक खाते में भेजी जायेगी। योजना इस वर्ष के खरीफ की फसल से लागू होगी। इस बीच किसानों को प्राकृतिक आपदा की स्थिति में मनरेगा के अंतर्गत भुगतान का प्रावधान है। सरकारी आंकड़ों के हिसाब से अगस्त-दिसम्बर 2015 में मनरेगा के अंतर्गत 71 करोड़ कार्य के दिन बने। वर्ष 2014-15 में 40.5 करोड़ कार्य थे। वर्ष 2013-14 में इस योजना में कार्य के दिन 57.3 करोड़ थे। मनरेगा के अंतर्गत किसानों को कम से कम वर्ष में परिवार के एक सदस्य को 100 दिन के काम का वादा है।

नई बीमा योजना में बजट प्रावधान वर्ष 2018-19 तक 7750 करोड़ रुपये तक हो जाएगा। जो वर्ष 2015-16 में करोड़ का है। 50 प्रतिशत खेती योग्य भूमि बीमा के दायरे में आ जायेगी। जो अभी 23 प्रतिशत है। आधा खर्च केन्द्र सरकार वहन करेगी और आधा राज्य सरकारें। जिन किसानों ने बैंकों से कर्ज लिए हैं उनके लिए योजना अनिवार्य होगी। फसल कटते समय उत्पादन आंकड़ों में इकट्ठा करने के लिए स्मार्टफोन और रिमोट सेलिंग के इस्तेमाल की बात भी नई योजना में है। पाले से फसल का नुकसान भी अब बीमा के अंदर होगा जो पहले नहीं था। नुकसान का आंकलन गांव को एक युनिट मानकर किया जाएगा पहले यह ब्लॉक और पंचायत के दायरे को रखकर किया जाता था।

अब तक चल रही योजनाओं में सरकार ने अपनी जिम्मेदारी पूरी देय रकम तक नहीं रखी थी। निर्धारित प्रतिशत तक ही सरकार देती थी, नई योजना में पूरी क्षतिपूर्ति का वादा है। सब्सिडी पर कैप हटा दिया गया है। जो इस योजना को पहले से अधिक आकर्षित बना सकता है।

पिछले तीन वर्षों से लगातार प्राकृतिक आपदाओं के कारण कृषि उत्पादन में कमी आई है। खाद्यानों के उत्पादन में कमी का एक और बड़ा कारण है किसानों का फलों और सब्जियों की खेती पर झुकाव फसल बीमा योजना इस स्थिति को नियंत्रण में रख सकती है, ऐसा माना जा रहा है। बीमा की पूरी राशि समय से मिलने का भरोसा ही इस योजना को सफल करने में सहायक होगी। सरकारी और निजी कंपनियां दोनों ही फसल बीमा योजना में भागीदार बनेंगी।

योजना कितनी सफल होगी पर इस बात पर भी निर्भर करता है कि राज्य सरकारें इसको कितनी गंभीरता से लेती हैं और क्रियान्वित करती हैं। पिछली सभी योजनाएं सहयोग और प्रशासनिक कमजोरियों के चलते असफल रहीं। कृषि मंत्री इसे “अमृत योजना”। गृहमंत्री किसानों का “सुरक्षा कवच” किन्तु विपक्ष संतुष्ट नहीं दिखता। छोटे किसानों और बड़े किसानों से पट्टे पर जमीन लेकर खेती करने वालों को भी इस योजना में लाने की मांग हो रही है।

(प्रो.लल्लन प्रसाद लेखक अर्थशास्त्र विभाग के पूर्व प्रमुख व डीन, दिल्ली विश्वविद्यालय और कौटिल्य फाउंडेशन के कार्यकारी अध्यक्ष हैं।)

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