दुनिया की राजनीति में तीन खेमे

दुनिया में भौगोलिक रुप से दो ही ध्रुव होते हैं, परन्तु विश्व राजनीतिक पटल पर आज तीन ध्रुव है और इन तीनों को फिलहाल कोई चुनौती देने वाला नहीं है।     

रुस अमेरिका और चीन के रुप में त्रिध्रुवीय विश्व की परिकल्पना उभर कर सामने आई है। ऐसा नही है कि तीनों ही देश इस स्थाना पर यकायक पहुँच गय़े है.. इसमें उनके इतिहास का अच्छा खासा योगदान रहा है। इस तेजी से बदलते हुए अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था में पिछले दो –तीन वर्षों में एक नया परिवर्तन तब हुआ जब इन अमेरीका और चीन के बेसुरे राग में रुस में एक नया आलाप छेड़ा और दुनिया पर धौंस पट्टी करने 1991 के बाद एक बार फिर उभरा । युक्रेन और काजिस्तान जैसे टुकडे खोने के बाद भी रुस को व्लादिमिर पुतिन के रुप में एक ऐसा तेज तर्रार और सक्षम नेता मिला जिसने कभी हाशिये पर आ चुके रुस को एक बार फिर महाशक्ति के रुप में स्थापित कर दिया चेचनिया मसले पर और हाल ही में सीरिया के आई एस आई एस के ठिकानों को नष्ट करने में जिस राजनैतिक इच्छा शक्ति का पुतिन ने इस्तेमाल किया उसमें कोई शक नहीं था कि वह फोर्ब्स पत्रिका के सबसे शक्तिशाली व्यक्तियों के ताजी फेहरिस्त में अव्वल स्थान पर काबिज होते। जहाँ एक और चीन शान्तिपूर्वक सह- अस्त्वित तथा युआन कूटनीतिक और देंग युग से उबरकर आक्रमक कूटनीति और राजनय कर रहा है वही अपनी शक्ति और सामर्थ्य से विश्व राजनीति के फलक पर बडी ताकत के रुप में उभरा है। रुस से 1917 के वोल्शेविक क्रान्ति के बाद गोर्वाचोव का ग्लासनोत्स तथा पेरोस्त्राइका जैसे सिद्धान्तों को समय के साथ अपनाया और अब अपने आपको पुनः शक्ति पुंज के रुप में स्थापित कर रहा है। रुस कभी नही भूल सकता की पूर्व सेवियत संघ के टूट कर बिखरने में अमेरिका कूटनीति क्रान्ति और सी.आई.ए. जैसी संस्था का हाथ रहा है। वन चाइना पालिसी के तहत चीन नें भी सिकुड कर भी अपनी शक्ति बटोरी है और अमेरिका से आँखे मिलाने का माद्दा भी जुटा लिया है।

सवाल यह है कि ये तीनों की ताकतें क्या गुटबन्दी के नये दौर को वापस लाने को सोच रहे हैं और विश्व को कुश्ती का अखाडा बनाने में जुटे हैं। गौरतलब यह है कि ये तीनों ही देश दुनिया का निजाम चलाने वाली सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं और भारत, ब्राजील, जर्मनी, जापान जैसे देशों के मौसमी दोस्त हैं यह तीनों ही उच्चतम स्तर की आणविक क्षमता रखते हैं, और सैन्य शक्ति में इनका प्रतिरोध करने वाला कोई नही है। यह भी एक अनुत्तरित प्रश्न है कि उत्तरी कोरिय़ा, अफगानिस्तान, ईरान और इजराइल मसलों पर ये कौन सा करवट बदलेंगे।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद साम्यवादी विचारधारा के प्रवर्तक और पोषक सोवियत संघ और लोकतंत्र की वकालत करने वाले संयुक्त राज्य अमेरिका के रुप में दिवध्रुवीय विश्व की परिकल्पना सार्थक हुई अगले 45 वर्षों में इन दोनो राष्ट्रों नें सामरिक, सामाजिक, सास्कृतिक, रणनीति और कूटनीतिक परिप्रेक्ष्य में अपनी ढपली अपना राग अलापा और विश्व के राजनीतिक रंग मंच पर अपनी हनक जताई।

दोनों देशों ने अपने अपने देशो ने अपने अपने गुट बनाये और एक दूसरे के खिलाफ जमकर लामबन्दी की। 1945 -1991 के दौर में दुनिया ने शीत युद्ध के माहौल में हर पल गर्म युद्ध जैसी आँच महसूस की। चाहे वियतनाम, कोरिया, क्यूबा, स्वेज नहर, भारत-पाकिस्तान मसला, अरब इजराइल युद्ध, इजराइल फिलिस्तीन विवाद और अफिगानिस्तान और इरान, इराक युद्ध, हर मुद्दे पर इन दोनो देशों ने अपनी अपनी बिसाते खुद बिछाई और जोड़ तोड़ वाली चाले चलीं। जून 1991 में सोवियत संघ विघटित हो गया और साम्यवादी ताकतो की कमर टूट गई। अमेरीका के रुप में दुनिया को एक नया चौधरी मिला जिसकी चोधाराहट हर किसी नें महसूस की। अगले डेढ दशक तक अमेरीका नें अन्तर्राष्ट्रीय रंगमंच पर कतिपय कमजोर देशों को निरन्तर नचाया। यू.एन.ओ. जैसा शक्तिशाली संगठन भी अमेरीका के रहमोकरम पर का मोहताज बन कर रह गया और उसको वही करना पडा जिसमें अमेरीका की रजामंदी थी।

अमेरीका की सुरक्षा और संप्रभुत्ता में सेंध तब लगी जब 2001 में अमेरीकी प्रभुत्व के प्रतीक वल्डट्रेड सेंटर को अलकायदा के फिदायिनो नें जमीदोज कर दिया अमेरीका अजेय और अभेद्य होने का गुरुर टूट गया लेकिन इसी के साथ आतंकवाद की मुखालफत करने के बहाने उसे दूसरे देशों में टाँग अडाने का नया शगल मिला। इसी दरम्यान चीन जिसके बारे में नेपोलियन बोनापार्ट ने एक बार कहा था कि यहाँ एक दैत्य सो रहा है उसे सोने दो क्योकिं जब वह जगेगा तो विश्व को हिला देगा, सच हुआ और उसने अमेरीका की एक ध्रुवीय व्यवस्था को चुनौती देते हुए अपनी उपस्थिति जताई। ताईवान मसला हो या जापान का शाण्डुगं द्वीप हो से सीमा विवाद हो या एशिया प्रंशात महासागर हो हर जगह चीन नें अपनी दादागिरी जताई और उनकी चालों को धता बताया । इतना ही नहीं, प्रति व्यक्ति आय आर्थिक उदारी करण, परमाणु क्षमता का संवर्द्धन और विकास, व्यापार, वाणिज्य जनसंख्या निय़ंत्रण, आधुनिक शस्त्रों से लैंस सैन्य शक्ति, सूचना प्रोद्योगिकी सभी मामलों में चीन ने अमेरीका की साख को प्रभावित किया और दूसरे ध्रुव के रुप में अपने आप को स्थापित किया। लगभग अगले एक दशक में चीन और अमेरिका ने पुरे विश्व को कबड्डी का मैदान बना दिया और एक दूसरे को पैतरो को समझते हुए अपनी अपनी दाँव चली। पूरी दुनिया बड़े चाव के साथ इन दोनों विपरीत राजनीतिक विचारधारा एवमं व्यवस्थाओं वाले देशों की झडपें देखीं।

चीन एशिया में अमेरीकी प्रभुत्व को चुनौती दे रहा है वही रुस तेजी के साथ पूर्वी युरोप और पश्चिमी एशिया में दखलन्दाजी कर रहा है अमेरीका की चौधाराहट और साख में निश्चित रुप से चीन और रुस बट्टा लगा रहे हैं, अमेरीका और रुस के तरह से चीन की अर्थव्यवस्था मजबूती के सात उभर चुकी है और भारत जैसे देशों का बाजार चीनी साजों सामान से अटा पडा है। दुनिया में भौगोलिक रुप से दो ही ध्रुव होते हैं, परन्तु विश्व राजनीतिक पटल पर हम शर्तिया यह कह सकते हैं कि तीन ध्रुव हैं और इन तीनों का हाल फिलहाल कोई मुकाबला नहीं है।

 

(अमित श्रीवास्तव लेखक अंतर्राष्ट्रीय संबंध और सामरिक विषय विशेषज्ञ हैं)    

Leave a Comment