देश के लिये नए तरह का समाजवाद चाहते थे नेताजी

नेताजी पूर्ण समाजवाद के प्रखर समर्थक थे। उनकी यह इच्छा थी कि भारत को अपने लिये अलग किस्म के समाजवाद और उसके नये उपायों का विकास करना चाहिए।

हर साल 23 जनवरी को महान स्वातंत्र्य योद्धा नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का जन्म दिवस विश्वभर में मनाया जाता है। नेताजी के स्मृति मात्र से मस्तिष्क में उनके 1857 से लेकर 1947 तक के लंबे स्वतंत्रता संग्राम की याद ताजा हो जाती है।

सुभाष चन्द्र बोस की नजरों में प्राचीन भारत न केवल लोकतांत्रिक बल्कि अन्य अत्यंत उन्नत सामाजिक राजनीतिक सिद्धांतों से भी अनभिज्ञ नहीं था। नेताजी का विचार था कि भारत में हमें समाजवाजी समाज के आदर्श को ध्यान में रखते हुए राजनैतिक लोकतंत्र का निर्माण करना चाहिए। जन्म, जाति सम्प्रदाय, वर्ग, धर्म पर विचार किये बिना सबको समान अवसर प्राप्त होने चाहिए। स्त्रियों को सार्वजनिक मामलों में और अधिक रूचि लेने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।

वह समाजवाद के समर्थक थे। लेकिन उनकी यह इच्छा थी कि भारत की अपनी ही किस्म के समाजवाद और नये प्रकार के उपायों का विकास करना चाहिए। वह उन लोगों को घोर विरोध करते थे जो कि यह कहा करते थे कि भारतीय जागृति पूर्णतया विदेशी आदर्शों और उपायों की प्रेरणा का परिणाम है। उन्होंने कहा था, “इसमें कोई संदेह नहीं है कि मैं इस विचार की तनिक भी आलोचना नहीं करता कि पाश्चात्य प्रभाव से हमें अपना बौद्धिक और नैतिक विकास करने में सहायता मिली है। लेकिन जिस प्रभाव से हम लोग स्वयं को पहचानने में समर्थ हुऐ हैं, और जिससे जो आंदोलन के हमें आज दर्शन होते हैं, वह पूर्णतया स्वदेशी आंदोलन है।”

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इस बात का प्रचार किया गया कि वे समाजवाद विरोधी हैं। वे जर्मनी के पक्ष में थे पर उन्होंने जर्मनी का पक्ष केवल अपनी मातृभाषा की स्वतंत्रता के लिए लिया था। जैसा कि विश्वास किया जाता था कि वे रूस विरोधी नहीं थे। 22 मई 1945 को बैंकाक में दिये गये एक भाषण में उन्होंने अपनी भावी कार्यक्रम के बारे में कहा था, “आजाद हिन्द की अस्थाई सरकार पूर्ण रूचि के साथ अंतर्राष्ट्रीय विकास में रूचि लेती रहेगी तथा उसका पूर्ण लाभ उठाने का प्रयास करेगी।”

उसी भाषण में उन्होंने यह भी कहा था, “अब तक यह स्पष्ट हो गया है कि रूस ब्रिटिश अमेरिकी लक्ष्यों से नितांत भिन्न हैं, यद्यपि इन तीनों का शत्रु एक ही है और वह है जर्मनी। सैन फ्रांसिस्को सम्मेलन में यह बात पूर्णतया स्पष्ट दी गई है जहाँ पर कि रूसी विदेश आयुक्त श्री मोलोटोव ने ब्रिटिश अमेरिकी मांगों को स्वीकार कर दिया। वस्तुतः श्री मोलोटोव इतना आगे बढ़ गये कि उन्होंने भारत और फिलिपीन्स का प्रतिनिधित्व करने के लिए आये क्रमशः ब्रिटेन और अमेरिका के हाथों की कठपुतलियों के परिचय पत्रों को भी स्वीकार नहीं किया। सैन फ्रांसिस्को सम्मेलन में जो मतभेद दृष्टिगोचर हुआ, वह केवल ब्रिटेन और अमेरिका तथा रूस के मध्य भावी तीव्र संघर्ष का पूर्व संकेत है। आज तक हम इन शब्दों की सत्यता का अवलोकन करते हैं और यह देखते रहे हैं कि भविष्य के नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की राजनैतिक दूरदृष्टि प्रदर्शित कर दी है।

उन्हें अमीरों और गरीबों की मनःस्थिति में एक विशेष अंतर दृष्टिगोचर होता था। उन्होंने ये विचार व्यक्त किये हैं- “जबकि आजाद हिन्द फौज विजय प्राप्त करने के लिए या आधे रास्ते में ही अपने खून की अंतिम बूंद चुका देने के लिए प्रशिक्षण ले रही है, अमीर लोग मुझसे यह पूछ रहे हैं कि पूरे पैमाने पर लड़ाई छेड़ देने का अर्थ उनके 10 प्रतिशत धन का व्यय होगा या 5 प्रतिशत धन का। मैं उन लोगों से यह पूछना चाहूँगा जो कि प्रतिशत की बात कर रहे हैं कि क्या हम अपने सैनिकों से यह कह सकते हैं कि वे अपना केवल 10 प्रतिशत खून गिराएं तथा शेष खून की रक्षा कर लें।

जो कोई भी व्यक्ति उनके विचारों का अध्ययन करता है वह अवश्य इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि वह अपने समय के अन्य किसी नेता की अपेक्षा जिन्हें समाजवादी कहा जाता है, अधिक समाजवादी थे। समाज वादी नेताओं की अपेक्षा वह उस समय कांग्रेसी नीतियों तथा कार्यक्रम के विरुद्ध थे, बल्कि उनका आधार जमींदार और किसान, पूंजीपति तथआ श्रमिक, तथाकथित उच्च वर्ग तथा निम्न वर्ग, स्त्री और पुरूष के मध्य समझौता कराने का प्रयास था। यह बात उन्होंने कराची में कही थी। उस काल के तथाकथित समाज वादी नेताओं में से किसी में भी यह बात कहने का साहस नहीं था।

वह निश्चित रूप से साम्राज्यवाद विरोधी थे, क्योंकि उन्होंने यह कहा था कि स्वतंत्र भारत सम्पूर्ण संसार में साम्राज्यवाद के विनाश का प्रतीक बन जायेगा। उनके अपने ही शब्दों में, “मैंने जो कुछ भी कहा है, उसका सारांश यह है कि मैं एक समाजवादी भारतीय गणतंत्र की कामना करता हूँ।”

24 जनवरी 1938 की लंदन के डेली वर्कर में प्रकाशित एक साक्षात्कार में उन्होंने स्पष्ट रूप से यह बात कही थी, “मेरी वास्तविक इच्छा यह थी कि हम भारतीय अपनी राष्ट्रीय स्वतंत्रता प्राप्त करने का प्रयत्न करें और ऐसा करके हम समाजवाद की दिशा में आगे बढ़े।

30 मार्च 1929 को रंगपुर राजनीतिक सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने कहा था, “किसी भी विचारधारा को बिल्कुल सही और पूर्ण सत्य पर आधारित मानना उचित नहीं है। हमें यह नहीं भुला देना चाहिए कि कार्ल मार्क्स के प्रमुख शिष्य रूसियों ने अंध भक्ति के साथ उनके विचारों का अनुसरण नहीं किया। जब उनके लिए सिद्धांतों को क्रिया रूप में परिणत करना कठिन हो गया तो उन्होंने ऐसी नई आर्थिक नीतियां अपनाई जो कि निजी संपत्ति तथा निजी औद्योगिक संस्थानों के विरुद्ध नहीं थीं। इसलिए हमें समाज और राजनीति को अपने आदर्शों और अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप ढ़ालना चाहिए।”

4 जुलाई 1939 को कलकत्ता में अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस के अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने समाजवाद में अपना विश्वास व्यक्त किया था इस ओर निर्देश किया था कि भारत को अपने लिए एक नवीन पथ का निर्माण करना चाहिए। उन्होंने अपने भाषण के अंत में कहा था, “मुझे इस बारे में तनिक भी संदेह नहीं है कि सम्पूर्ण विश्व की भांति भारत की मुक्ति भी समाजवाद पर निर्भर है। भारत को अन्य देशों के अनुभवों से शिक्षा लेनी चाहिए। लेकिन साथ ही भारत को अपनी आवश्यकताओं और अपने वातावरण को नजर में रखते हुए अपने लिए नये तरीकों की भी ईजाद करनी  चाहिए।

किसी भी सिद्धांत को व्यवहार में लाने के लिए यह आवश्यक है कि भूगोल और इतिहास का पूर्ण ध्यान रखा जाये और यदि आप इन दोनों बातों का ध्यान नहीं रखेंगे तो आप निश्चय ही असफल रहेंगे। इसलिए भारत को अपने लिए एक नये समाजवाद के बारे में प्रयोग कर रहा है तो हमें भी वैसा ही क्यों नहीं करना चाहिए? यह संभव है कि भारत जिस समाजवाद का विकास करेगा, उसमें कुछ ऐसी नवीनतम तथा मौलिकता हो जिससे कि सम्पूर्ण विश्व का कल्याण हो सके।”

(संदीप कुमार सिंह लेखक हिंदी पत्रकारिता के शोधकर्ता है)

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